ओउम् नम: शिवाय
( होरी काव्य सागर )
(छन्द )-3
कभी ग़रीबी , कभी अशिक्षा , कभी धर्म की आड़ ।
जनसंख्या के हम नित नित , करते खड़े पहाड़ ।।
भगवान की देन हैं बच्चे कह पुनः शुरू हो जाते ।
बच्चे जनने की मशीन को निश दिन रहे चलाय ।।
ओउम् नम: शिवाय , ओउम् नम: शिवाय ।।
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Saturday, 11 May 2013
Friday, 10 May 2013
ओउम् नम: शिवाय
ओउम् नम: शिवाय
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[ होरी काव्य सागर ]
(छन्द)--2
नेता जी का चेहरा भोला , नीयत टेढ़ी मेढ़ी ।
बार बार जनता को पेरा , जैसे गन्ना पेड़ी ।।
नोवा पैरों में डाला जो प्रजातन्त्र की बेड़ी ।
जीवन भर जनता को दूहा जइस दुधारू गाय ।।
ओउम् नम: शिवाय , ओउम् नम: शिवाय ।
००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००
राज कुमार सचान होरी
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[ होरी काव्य सागर ]
(छन्द)--2
नेता जी का चेहरा भोला , नीयत टेढ़ी मेढ़ी ।
बार बार जनता को पेरा , जैसे गन्ना पेड़ी ।।
नोवा पैरों में डाला जो प्रजातन्त्र की बेड़ी ।
जीवन भर जनता को दूहा जइस दुधारू गाय ।।
ओउम् नम: शिवाय , ओउम् नम: शिवाय ।
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राज कुमार सचान होरी
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Tuesday, 7 May 2013
Fwd: बदलता भारत के दोहे
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From: Rajkumar sachan <horirajkumar@gmail.com>
Date: 27 April 2013 11:27:21 AM GMT+05:30
Subject: बदलता भारत के दोहे
बदलता भारत के दोहे***********************************************(१)परिवर्तन की लीजिये , सदा श्वंास प्रश्वांस ।बदलेगा भारत कभी, यही आश विश्वास ।।(२) भारत को बदलो ,उठो ,चलो हमारे साथ ।होरी बढ़ो , बढ़ो ,बढ़ो ,लिये हाथ में हाथ ।।(३) जनसंख्या इस भाँति ,यदि, बढ़ी और श्रीमान ।मेले से बन जायेंगे , सारे नगर सचान ।।(४) भारत में होगा कभी , जनसंख्या विस्फोट ।
Monday, 6 May 2013
मुक्तक -------
मुक्तक -------
०००००००००००००००००००००००००००००००००
१- ब्रह्म हूं मैं , जानता हूं ।
ब्रह्म तुम भी ,मानता हूं ।।
ब्रह्म ही है तत्व जो ,
अक्षर रहेगा, जानता हूं ।।
२- आइये हम साथ हों , भारत बदलने के लिये ,
आमजन के हेतु हम ,कुछ तो करें , कुछ भी करें ।
हाथ में ले हाथ , हम बढ़ते रहें , बढ़ते रहें ,
मोतियों से देश की होरी सदा झोली भरें ।।
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१- ब्रह्म हूं मैं , जानता हूं ।
ब्रह्म तुम भी ,मानता हूं ।।
ब्रह्म ही है तत्व जो ,
अक्षर रहेगा, जानता हूं ।।
२- आइये हम साथ हों , भारत बदलने के लिये ,
आमजन के हेतु हम ,कुछ तो करें , कुछ भी करें ।
हाथ में ले हाथ , हम बढ़ते रहें , बढ़ते रहें ,
मोतियों से देश की होरी सदा झोली भरें ।।
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Saturday, 4 May 2013
5 अस्पृश्ता निवारण और सामाजिक समरसता
5 अस्पृश्ता निवारण और सामाजिक समरसता
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इस देश का ऐतिहासिक कटु सत्य है ़़़़जातियां और जातियाँ ।जातियों के अन्दर जातियाँ । जातियों के बाहर जातियाँ । इनमें कोयी ऊँचा तो कोयी नीचा । छुआछूत अभी तक जारी । विवाह ,भोजन में पृथक पृथक । यहाँ तक धर्म परिवर्तन के पश्चात भी जातियाँ विद्यमान हैं और उनमें छोटी बड़ी सभी ।
देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि इन असंख्य जातियों के कारण अस्पृश्ता बनी हुयी है और सामाजिक समरसता अन्त्यन्त क्षीण है । कभी धर्म के कारण तो कभी जातियों के कारण समाज में एकता नहीं आ पाती , राष्ट्र वाद की भीषण कमी है ।
इस देश को जिसने भी जाना समझा उसने सबसे पहले अछूत (अस्पृश्य ) को गले लगाया ़़़़़गांधी को ही देख लीजिये हमेंशा अछूतोद्धार के लिये कार्य किया ।
आइए देश की इस घृणित कुरीति को हमेशा के लिये जड़ से उखाड़ फेंकने और जातियो के अन्तर को मिटाने के लिये हमारे साथ आयें । कंधा से कंधा मिलायें । इंडिया चेंजेज़ के साथ आयें । प्रत्येक शुबह की शुरुआत किसी अछूत समझे जाने वाले परिवार के घर प्रात:भोजन से करें, दोपहर एक मज़दूर के यहाँ भोजन और रात एक किसान के घर भोजन , यह हमारी पद्धति है समरसता की ।
अगर गाँव और शहर गंदे हों ,सफाई न हो तो वहाँ के रहने वाले कैसे स्वच्छ रहेंगे ? कैसे स्वस्थ रहेंगे ? पर आज भी स्थिति बनी हुई है कि सभी जगह भारी गंदगी है और सफाई करने वालों की भारी कमी । जनसंख्या के मानकों के अनुसार सफाई कर्मियों की शीघ्र भर्ती आवश्यक है वह भी केवल सफाईकर्मी परिवारों से, यह हमारी महत्वपूर्ण माँग है ।
हमारी माँग है, अंतर्जातीय विवाहों को बढ़ावा देना ।ऐसा करने वालों को सम्मानित करना ।
इंडिया चेंजे़ज़ ( INDIA CHANGES )
www.indiachanges.com , horiindiachanges.blogspot.com ,horibadaltabharat.blogspot.com
Eid -indiachanges2013@gmail.com
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इस देश का ऐतिहासिक कटु सत्य है ़़़़जातियां और जातियाँ ।जातियों के अन्दर जातियाँ । जातियों के बाहर जातियाँ । इनमें कोयी ऊँचा तो कोयी नीचा । छुआछूत अभी तक जारी । विवाह ,भोजन में पृथक पृथक । यहाँ तक धर्म परिवर्तन के पश्चात भी जातियाँ विद्यमान हैं और उनमें छोटी बड़ी सभी ।
देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि इन असंख्य जातियों के कारण अस्पृश्ता बनी हुयी है और सामाजिक समरसता अन्त्यन्त क्षीण है । कभी धर्म के कारण तो कभी जातियों के कारण समाज में एकता नहीं आ पाती , राष्ट्र वाद की भीषण कमी है ।
इस देश को जिसने भी जाना समझा उसने सबसे पहले अछूत (अस्पृश्य ) को गले लगाया ़़़़़गांधी को ही देख लीजिये हमेंशा अछूतोद्धार के लिये कार्य किया ।
आइए देश की इस घृणित कुरीति को हमेशा के लिये जड़ से उखाड़ फेंकने और जातियो के अन्तर को मिटाने के लिये हमारे साथ आयें । कंधा से कंधा मिलायें । इंडिया चेंजेज़ के साथ आयें । प्रत्येक शुबह की शुरुआत किसी अछूत समझे जाने वाले परिवार के घर प्रात:भोजन से करें, दोपहर एक मज़दूर के यहाँ भोजन और रात एक किसान के घर भोजन , यह हमारी पद्धति है समरसता की ।
अगर गाँव और शहर गंदे हों ,सफाई न हो तो वहाँ के रहने वाले कैसे स्वच्छ रहेंगे ? कैसे स्वस्थ रहेंगे ? पर आज भी स्थिति बनी हुई है कि सभी जगह भारी गंदगी है और सफाई करने वालों की भारी कमी । जनसंख्या के मानकों के अनुसार सफाई कर्मियों की शीघ्र भर्ती आवश्यक है वह भी केवल सफाईकर्मी परिवारों से, यह हमारी महत्वपूर्ण माँग है ।
हमारी माँग है, अंतर्जातीय विवाहों को बढ़ावा देना ।ऐसा करने वालों को सम्मानित करना ।
इंडिया चेंजे़ज़ ( INDIA CHANGES )
www.indiachanges.com , horiindiachanges.blogspot.com ,horibadaltabharat.blogspot.com
Eid -indiachanges2013@gmail.com
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दो दिवसीय उपवास ( अनशन ) ,धरनास्थल, दारुल सफा,लखनऊ
दो दिवसीय उपवास ( अनशन ) ,धरनास्थल, दारुल सफा,लखनऊ
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दिनांक एक मई को मज़दूर दिवस पर INDIA CHANGES (बदलता भारत ) तथा अर्जक साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय उपवास और धरना प्रदेश स्तर पर किया गया , जिसका नेतृत्व दोनो संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ,प्रसिद्ध कवि , साहित्यकार , समाजसेवी एवं प्रखर वक्ता श्री राज कुमार सचान "होरी" ने किया ।
चौदह सूत्री ज्ञापन धरना स्थल पर आकर अपर नगर मजिस्ट्रेट ने लिया ।इस अवसर पर भारी संख्या में लोगों ने भाग लिया । मुख्य वक्ता श्री राज कुमार सचान "होरी" ने संचालन करते हुये कहा कि बुद्धिजीवी को राजनीति में आना ही होगा अन्यथा देश में परिवर्तन नहीं होगा । अब भारत बदल रहा है , उसमें मौलिक परिवर्तन के लिये सृजन करना होगा । कलम उठाना होगा , देश की पिछड़ी जातियाँ लेखन से दूर होने के कारण और पिछड़ गईं ।दलित जातियों ने भी कोई लेखक , कवि पैदा करनें में संगठित प्रयास नहीं किये । दोनो ने उच्च जातियों से वैमनस्य का पाठ ही पढ़ा । बुद्ध , अम्बेडकर , लोहिया , राम स्वरूप वर्मा के बौद्धिक कार्यों को इनके ही अनुयायियों नें नहीं माना ।
होरी ने सम्बोधन में कहा कि आइये अब चाणक्य बनिये , वशिष्ठ बनिये । रानीतिक के साथ साथ साहित्यिक , धार्मिक सत्ता प्राप्त करना आवश्यक है ।अन्य वक्ताओं में इंडिया चेंजेज़ के प्रदेश संयोजक श्री हरिपाल सिंह , राष्ट्रीय अध्यक्ष शोषित समाज दल श्री अखिलेश कटियार , प्रदेश अध्यक्ष शोषित समाज दल श्री केदार सचान , श्री नत्थूलाल सचान कानपुर, श्री फूल चंद्र चौधरी , मीडिया प्रभारी बदलता भारत श्री रिज़वान चंचल , श्री जंग बहादुर पटेल बाराबंकी , सत्येंद्र पटेल फ़तेहपुर , जगदीश्वर पटेल लखनऊ ,श्री अशोक पटेल महाराजगंज , प्रियंका कटियार प्रदेश महिला अध्यक्ष शोषित समाज दल , राजेश सचान आदि मुख्य रहे ।
सम्पूर्ण देश में बदलता भारत के द्वारा लगातार अभियान चलाये जा रहे हैं । आप आयें ----
देश की माटी बुलाती है तुम्हें ,
आओ उठकर राष्ट्र ध्वज को थाम लो ।
धर्म और जातियों का भाव तज ,
प्यारों बेटो , भारत माँ का नाम लो । (होरी )
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दिनांक एक मई को मज़दूर दिवस पर INDIA CHANGES (बदलता भारत ) तथा अर्जक साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय उपवास और धरना प्रदेश स्तर पर किया गया , जिसका नेतृत्व दोनो संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ,प्रसिद्ध कवि , साहित्यकार , समाजसेवी एवं प्रखर वक्ता श्री राज कुमार सचान "होरी" ने किया ।
चौदह सूत्री ज्ञापन धरना स्थल पर आकर अपर नगर मजिस्ट्रेट ने लिया ।इस अवसर पर भारी संख्या में लोगों ने भाग लिया । मुख्य वक्ता श्री राज कुमार सचान "होरी" ने संचालन करते हुये कहा कि बुद्धिजीवी को राजनीति में आना ही होगा अन्यथा देश में परिवर्तन नहीं होगा । अब भारत बदल रहा है , उसमें मौलिक परिवर्तन के लिये सृजन करना होगा । कलम उठाना होगा , देश की पिछड़ी जातियाँ लेखन से दूर होने के कारण और पिछड़ गईं ।दलित जातियों ने भी कोई लेखक , कवि पैदा करनें में संगठित प्रयास नहीं किये । दोनो ने उच्च जातियों से वैमनस्य का पाठ ही पढ़ा । बुद्ध , अम्बेडकर , लोहिया , राम स्वरूप वर्मा के बौद्धिक कार्यों को इनके ही अनुयायियों नें नहीं माना ।
होरी ने सम्बोधन में कहा कि आइये अब चाणक्य बनिये , वशिष्ठ बनिये । रानीतिक के साथ साथ साहित्यिक , धार्मिक सत्ता प्राप्त करना आवश्यक है ।अन्य वक्ताओं में इंडिया चेंजेज़ के प्रदेश संयोजक श्री हरिपाल सिंह , राष्ट्रीय अध्यक्ष शोषित समाज दल श्री अखिलेश कटियार , प्रदेश अध्यक्ष शोषित समाज दल श्री केदार सचान , श्री नत्थूलाल सचान कानपुर, श्री फूल चंद्र चौधरी , मीडिया प्रभारी बदलता भारत श्री रिज़वान चंचल , श्री जंग बहादुर पटेल बाराबंकी , सत्येंद्र पटेल फ़तेहपुर , जगदीश्वर पटेल लखनऊ ,श्री अशोक पटेल महाराजगंज , प्रियंका कटियार प्रदेश महिला अध्यक्ष शोषित समाज दल , राजेश सचान आदि मुख्य रहे ।
सम्पूर्ण देश में बदलता भारत के द्वारा लगातार अभियान चलाये जा रहे हैं । आप आयें ----
देश की माटी बुलाती है तुम्हें ,
आओ उठकर राष्ट्र ध्वज को थाम लो ।
धर्म और जातियों का भाव तज ,
प्यारों बेटो , भारत माँ का नाम लो । (होरी )
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Friday, 3 May 2013
दो दिवसीय उपवास ( अनशन ) ,धरनास्थल, दारुल सफा,लखनऊ
दो दिवसीय उपवास ( अनशन ) ,धरनास्थल, दारुल सफा,लखनऊ
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आज दिनांक एक मई को मज़दूर दिवस पर INDIA CHANGES (बदलता भारत ) तथा अर्जक साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय उपवास और धरना प्रदेश स्तर पर किया गया , जिसका नेतृत्व दोनो संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ,प्रसिद्ध कवि , साहित्यकार , समाजसेवी एवं प्रखर वक्ता श्री राज कुमार सचान "होरी" ने किया ।
चौदह सूत्री ज्ञापन धरना स्थल पर आकर अपर नगर मजिस्ट्रेट ने लिया ।इस अवसर पर भारी संख्या में लोगों ने भाग लिया । मुख्य वक्ता श्री राज कुमार सचान "होरी" ने संचालन करते हुये कहा कि बुद्धिजीवी को राजनीति में आना ही होगा अन्यथा देश में परिवर्तन नहीं होगा । अब भारत बदल रहा है , उसमें मौलिक परिवर्तन के लिये सृजन करना होगा । कलम उठाना होगा , देश की पिछड़ी जातियाँ लेखन से दूर होने के कारण और पिछड़ गईं ।दलित जातियों ने भी कोई लेखक , कवि पैदा करनें में संगठित प्रयास नहीं किये । दोनो ने उच्च जातियों से वैमनस्य का पाठ ही पढ़ा । बुद्ध , अम्बेडकर , लोहिया , राम स्वरूप वर्मा के बौद्धिक कार्यों को इनके ही अनुयायियों नें नहीं माना ।
होरी ने सम्बोधन में कहा कि आइये अब चाणक्य बनिये , वशिष्ठ बनिये । रानीतिक के साथ साथ साहित्यिक , धार्मिक सत्ता प्राप्त करना आवश्यक है ।अन्य वक्ताओं में इंडिया चेंजेज़ के प्रदेश संयोजक श्री हरिपाल सिंह , राष्ट्रीय अध्यक्ष शोषित समाज दल श्री अखिलेश कटियार , प्रदेश अध्यक्ष शोषित समाज दल श्री केदार सचान , श्री नत्थूलाल सचान कानपुर, श्री फूल चंद्र चौधरी , मीडिया प्रभारी बदलता भारत श्री रिज़वान चंचल , श्री जंग बहादुर पटेल बाराबंकी , सत्येंद्र पटेल फ़तेहपुर , जगदीश्वर पटेल लखनऊ ,श्री अशोक पटेल महाराजगंज , प्रियंका कटियार प्रदेश महिला अध्यक्ष शोषित समाज दल , राजेश सचान आदि मुख्य रहे ।
सम्पूर्ण देश में बदलता भारत के द्वारा लगातार अभियान चलाये जा रहे हैं । आप आयें ----
देश की माटी बुलाती है तुम्हें ,
आओ उठकर राष्ट्र ध्वज को थाम लो ।
धर्म और जातियों का भाव तज ,
प्यारों बेटो , भारत माँ का नाम लो । (होरी )
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आज दिनांक एक मई को मज़दूर दिवस पर INDIA CHANGES (बदलता भारत ) तथा अर्जक साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय उपवास और धरना प्रदेश स्तर पर किया गया , जिसका नेतृत्व दोनो संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ,प्रसिद्ध कवि , साहित्यकार , समाजसेवी एवं प्रखर वक्ता श्री राज कुमार सचान "होरी" ने किया ।
चौदह सूत्री ज्ञापन धरना स्थल पर आकर अपर नगर मजिस्ट्रेट ने लिया ।इस अवसर पर भारी संख्या में लोगों ने भाग लिया । मुख्य वक्ता श्री राज कुमार सचान "होरी" ने संचालन करते हुये कहा कि बुद्धिजीवी को राजनीति में आना ही होगा अन्यथा देश में परिवर्तन नहीं होगा । अब भारत बदल रहा है , उसमें मौलिक परिवर्तन के लिये सृजन करना होगा । कलम उठाना होगा , देश की पिछड़ी जातियाँ लेखन से दूर होने के कारण और पिछड़ गईं ।दलित जातियों ने भी कोई लेखक , कवि पैदा करनें में संगठित प्रयास नहीं किये । दोनो ने उच्च जातियों से वैमनस्य का पाठ ही पढ़ा । बुद्ध , अम्बेडकर , लोहिया , राम स्वरूप वर्मा के बौद्धिक कार्यों को इनके ही अनुयायियों नें नहीं माना ।
होरी ने सम्बोधन में कहा कि आइये अब चाणक्य बनिये , वशिष्ठ बनिये । रानीतिक के साथ साथ साहित्यिक , धार्मिक सत्ता प्राप्त करना आवश्यक है ।अन्य वक्ताओं में इंडिया चेंजेज़ के प्रदेश संयोजक श्री हरिपाल सिंह , राष्ट्रीय अध्यक्ष शोषित समाज दल श्री अखिलेश कटियार , प्रदेश अध्यक्ष शोषित समाज दल श्री केदार सचान , श्री नत्थूलाल सचान कानपुर, श्री फूल चंद्र चौधरी , मीडिया प्रभारी बदलता भारत श्री रिज़वान चंचल , श्री जंग बहादुर पटेल बाराबंकी , सत्येंद्र पटेल फ़तेहपुर , जगदीश्वर पटेल लखनऊ ,श्री अशोक पटेल महाराजगंज , प्रियंका कटियार प्रदेश महिला अध्यक्ष शोषित समाज दल , राजेश सचान आदि मुख्य रहे ।
सम्पूर्ण देश में बदलता भारत के द्वारा लगातार अभियान चलाये जा रहे हैं । आप आयें ----
देश की माटी बुलाती है तुम्हें ,
आओ उठकर राष्ट्र ध्वज को थाम लो ।
धर्म और जातियों का भाव तज ,
प्यारों बेटो , भारत माँ का नाम लो । (होरी )
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Wednesday, 24 April 2013
अश्लील साहित्य और शराब
अश्लील साहित्य और शराब
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छोटी बच्चियों से लेकर समाज की हर स्त्री को उपभोग की वस्तु बनाया है हमारे अतिशय शराब और अश्लील साहित्य के मन माने उपयोग ने ।सरकारें अधिक से अधिक आय बढा़ने के लिये शराब की बिक्री बढ़ाती है । आज इंटरनेट के द्वारा घर घर पोर्न सामग्री देखी जा रही है। पोर्न स्टार कहने में झिझक नहीं ।
आइये अभियान चलायें ।
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छोटी बच्चियों से लेकर समाज की हर स्त्री को उपभोग की वस्तु बनाया है हमारे अतिशय शराब और अश्लील साहित्य के मन माने उपयोग ने ।सरकारें अधिक से अधिक आय बढा़ने के लिये शराब की बिक्री बढ़ाती है । आज इंटरनेट के द्वारा घर घर पोर्न सामग्री देखी जा रही है। पोर्न स्टार कहने में झिझक नहीं ।
आइये अभियान चलायें ।
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Tuesday, 23 April 2013
उत्थान , समानता का रास्ता -बौद्धिक सत्ता
उत्थान , समानता का रास्ता -बौद्धिक सत्ता
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हमारे देश में धर्मों के अनुपालन में जितना लचीलापन है उतना विश्व के किसी भी देश में नहीं है , परन्तु वहीं यह भी कटु सत्य है कि जातियों को लेकर जितनी कट्टरता और कठोरता अपने देश में है उतनी कहीं नहीं । हिन्दुओं में पूर्ण छूट है ------ईश्वर को साकार मानो चाहे निराकार , देवी मानो या देवता मानो , एक मानो चाहे अनेक । पूजा स्थल भी प्रथक ।धार्मिक पुस्तक भी प्रथक ।यहाँ तक अनीश्वरवादी , नास्तिक भी हिन्दू हो सकता है । हिन्दुओं की भाँति खुलापन दुनिया में अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं । मानव को इतनी स्वतन्त्रता वरेण्य है ।स्तुत्य है । तभी कदाचित भारत भूभाग ही ऐसा है जहाँ विश्व के सारे धर्म या तो जन्में हैं अथवा फूले फले हैं । इसका हमें गर्व है । यहाँ धर्मों पर शास्त्रार्थ करना परम्परा है । यही कारण रहा है कि इस भूभाग में धर्मों का विकास सर्वाधिक रहा है ।
धर्मों के क्षेत्र की स्वतन्त्रता और सरलता सामाजिक क्षेत्र में कहीं नहीं दिखती है । समाज में वर्ण और जातियों के अकाट्य बन्धन हैं , जिन्हें पहले कर्म से बनाया गया वे सब जन्म से होकर रूढ़ बन गयीं । जातियाँ व्यवसायों के आधार पर बनती रहीं और जितने व्यवसाय उतनी जातियों की स्थिति आ गयी । उदाहरण के लिये पान बेचने वाला तोली , बर्तन बनाने वाला कुम्हार , पानी भरने वाला कहार , लकड़ी का काम करने वाला बढ़यी, लोहे के काम वाला लोहार , कपड़े धोने वाला धानुक ,चमड़े के काम वाला चमार , नाव चलाने वाला केवट , भेड़ बकरी पालने वाला गड़रिया , गाय भैंस पालने वाला अहीर, सामान्य कृषक कुर्मी, सब्जी करने वाला काछी आदि आदि ।
व्यवसायों के अतिरिक्त अन्तरजातीय विवाहों से वर्ण संकर जातियाँ बनती रहीं । यहाँ तक कि धर्म परिवर्तन के बाद भी हिन्दू अपनी जातियों को वहांं भी ले गया । तभी मुस्लिम और ईसाइओं में भी जातियाँ मिलती हैं ।जातियों जातियों में जहाँ आरम्भ में कर्म का महत्व था धीरे धीरे जन्म महत्वपूर्ण होने लगा और इतिहास गवाह है कि जन्म आधारित जातीय हिंसा से यह देश लगातार पीड़ित रहा है ।
सामाजिक क्षेत्र में जितना रूढ़ हिन्दू समाज है उतना कोई भी नहीं । यहाँ जातियाँ जन्म से निर्धारित हो जाती हैं और कर्म से उनमें कोई भी बदलाव सम्भव नहीं । निम्न जाति कितना भी उच्च कार्य करे वह निम्न ही बनी रहती है , कभी भी उच्च जाति में प्रवेश नहीं कर पाती । इसी प्रकार उच्च जाति कितना भी निम्न और पतित काम करे वह बेधड़क , बेखौफ़ उच्च ही बनी रहती है , उसे किसी भी तरह निम्न जाति में जाने का ख़तरा नहीं रहता ।
वर्तमान जातिव्यवस्था में अच्छे और बुरे कर्मों का कोई स्थान नहीं । ब्राह्मण -ब्राह्मण रहेगा , वैश्य - वैश्य , क्षत्रिय -क्षत्रिय , शूद्र -शूद्र । यही नहीं इन चारों वर्णों के अन्तर्गत हज़ारों जातियाँ हैं जो भी वही की वही बनी रहती हैं। इस कठोर और आदिम व्यवस्था से हिन्दुस्तान का जहाँ सामाजिक विकास ठहर गया , वहीं सदियों से आपस में जातिगत दूरियाँ बनी रहीं । यहाँ तक हुआ है -- इतिहास गवाह है ,विदेशी आक्रमणों के समय भी हम जातीय दूरी के कारण एक होकर अपनी रक्षा न कर सके , भले ही बार बार गुलामी का कड़वा घूंट पीते रहे ।
जब बौद्ध धर्म आया तब कुछ काल के लिये ही सही मानववाद की स्थापना हुई , परन्तु भारत में उसकी स्थिति कुछ वर्षों के बाद कमज़ोर हो गई । जातियों और वर्णों के विरुद्ध समय समय पर आवाजें भी उठती रहीं और आन्दोलन भी होते रहे परन्तु निर्णायक युद्ध , आन्दोलन कभी लड़े ही नहीं जा सके । अम्बेडकर , लोहिया और दक्षिण भारत में रामास्वामी नायकर तो उत्तर भारत में राम स्वरूप वर्मा उल्लेखनीय नाम हैं ।
इन सबके बाद भी 21वीं सदी में भी स्थिति जस की तस है । जातिवाद कम नहीं हुआ है । जातीय दूरियाँ पहले की तरह बनी हुई हैं आरक्षणकी व्यवस्था से यद्यपि समानता बढ़ी है , परन्तु वैमनस्य भी बढ़ा है । आखिर इसका समाधान कहाँ है ?
आइये इस सामाजिक बीमारी का गहन परीक्षण करें । जहाँ उच्च जातियों में अपने से निम्न जातियों से समानता रखने में अरुचि है वहीं पिछड़ी और दलित जातियों में उच्च बनने की ललक तो है परन्तु रास्तों में भटकाव है । राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के प्रयत्नों में सफलता तो मिली , पर बात बनी नहीं । आंकड़े कुछ और ही कह रहे हैं । प्रगति के आंकड़े बहुत संतोषजनक नहीं कहे जा सकते । नौकरियों ,कुछ अन्य क्षेत्रों में प्रगति इतनी नाकाफी है कि समाज में पिछड़ों , दलितों को अभी भी सामाजिक दृष्टि से हेय समझा जाता है ।
हमें इसके लिये वर्ण व्यवस्था के मूल में जाना होगा । कार्यों का विभाजन देखिये ------जो बौद्धिक कार्य करे वह ब्राह्मण और उसे सर्वोच्च , सर्वश्रेष्ठ माना गया । जो रक्षा , सुरक्षा ,युद्ध ,शासन इत्यादि कार्य करे और सत्ता को स्थापित रखे वह क्षत्रिय और इसे द्वितीय स्थान मिला । ग्राम , नगर में व्यवसाय करने और मूल रूप से लक्ष्मी साधना करने वाले वैश्य या वणिक और यह वर्ण तृतीय स्थान पर आया । अन्तिम स्थान मिला उसे जो सबकी सेवा कार्य करे और कहलाया शूद्र । अब इसका सूक्ष्म परीक्षण कीजिये । एक -जनसंख्या के हिसाब से ऊपर के तीन वर्णों में आने वालों की संख्या कुल जनसंख्या का लगभग 20% है । सेवा कार्य करने वालों की संख्या 80% है । आज के पिछड़ों को किस वर्ण में रखेंगे -- शुद्ध क्षत्रिय वर्ण उन्हें अपने साथ नहीं रखता और शूद्रों से अपने को ऊपर मानते हैं । अनुसूचित और दलित तो हैं ही शूद्र वर्ण में । सामाजिक सम्मान की दृष्टि से देखें तो आज भी राजनैतिक सत्ता प्राप्त करने के बावजूद अहीर -अहीर कहा जाता है , कुर्मी -कुर्मी , चमार -चमार आदि आदि । ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य वर्ण वाला सम्मान इन्हें कभी नहीं मिल पाता है ।
स्वतन्त्र भारत में एक परिवर्तन और आया जिसका उल्लेख किया जाना आवश्यक होगा ।अब सामाजिक वर्गीकरण की अन्य तरह की चार श्रेणियाँ बन गई हैं । ये हैं ----(1) सामान्य जातियाँ
(2) पिछड़़ी जातियाँ
(3) अनुसूचित जातियाँ
(4) अनुसूचित जन जातियाँ
जनसंख्या का प्रतिशत महत्वपूर्ण है ।
सामान्य 20% , पिछड़ी 60% ,अनुसूचित 20%
इस जनसंख्या में 20% उच्च वर्णों के अन्दर और 80% निम्न वर्ण में हैं ।
पिछड़ों और दलितों में राजनैतिक चेतना के लिये समय समय पर जितना किया जाता रहा उसके मुकाबले बौद्धिक सत्ता प्राप्त करने के लिये न के बराबर काम हुये । राजनैतिक सत्ता को अगर ज्ञत्रियत्व माना जाय तो कहा जा सकता है कि क्षत्रिय बनने के लिये तो लगातार प्रयत्न हुये पर सर्वोच्च सत्ता --ब्राह्मणत्व को प्राप्त करने के लिये प्रयत्न लगभग किये ही नहीं गये । इन वर्गों में पढ़ाई -लिखाई , बौद्धिक कार्यों में अरुचि ही रही जिससे उच्च सम्मान के हकदार ये कभी न बन सके ।
समय समय पर इन समाजों में जागरूकता के कार्यक्रम तो चलाये गये पर सतही स्तर पर ही रहे । पिछड़ों , दलितों के विभिन्न संगठनों का ध्यान कभी भी बौद्धिक सत्ता प्राप्त करने पर टिका ही नहीं । मैं स्वयं जीवन भर इनके अनेक संगठनों में रहा परन्तु लाख प्रयत्न करने के बावजूद इनमें विशेष रुचि जाग्रत करने में असमर्थ रहा । वास्तव में ये सारे समाज अपने रूढ़िवादी ढांचे से ही त्रस्त हैं ।अपनी जड़ता से ग्रस्त ये समाज बौद्धिक कार्यों में रुचि ही नहीं लेते और अपनी मूढ़ता , पिछडे़पन का का सारा ठीकरा ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर फोड़ देते हैं । यही कारण है कि आज भी ,2013 तक इन वर्गों में लेखक , कवि , रचनाकार , पत्रकार , कलमकार , कलाकार दीपक लेकर खोजने से भी नहीं मिलते ।
इन वर्गों में इस दुर्गति को अच्छी तरह समझना होगा ।वास्तविक बीमारी को समझ कर ही उसका निदान खोजना उचित होता है । पहले यह मान लेना पड़ेगा कि अतीत की स्थिति कुछ भी रही हो ,कम से कम अब स्वतन्त्रता के बाद ब्राह्मणवाद को दोष देना कदापि उचित नहीं । अब मानना ही पड़ेगा कि हम में पढ़े लिखे कम हैं , विद्वान नहीं हैं , लेखक , कवि , पत्रकार नहीं , हम पुस्तकें नहीं लिख रहे ---तो इन सबके लिये केवल हमारा वर्ग ही दोषी है और विशेषकर सामाजिक और राजनैतिक नेता । इनकी सोच और मानसिकता आज भी पिछड़ी है , दलित है । आज भी भारी संख्या में इन वर्गों में शराब और नशे का सेवन है , पढ़ाई लिखाई के प्रति समर्पण नहीं ।
इस पृष्ठभूमि में विचारोपरान्त मेरे द्वारा इन 80% लोगों के समाजों के लिये लेखन में रुचि जाग्रत करने , व्यापक लेखकीय कर्म करने , पत्रकारिता करने , पुस्तकें लिखने , कलमकार और कलाकार बनने ---आदि क्षेत्रों में कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं । मेरी कोशिश है कि ज्ञान और बौद्धिक क्षेत्र के सारे कार्यों को ये वर्ग करने लगें और समाज के उच्च कहे जाने वर्गों के साथ कंधे से कन्धा मिलाने लगें । जब ये वर्ग बौद्धिक सत्ता प्राप्त कर लेंगे तब स्वयं ही ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो जायेंगे । धर्म , दर्शन , ज्ञान , विज्ञान के क्षेत्रों में इनका भारी दखल हो जाने से स्वयं सम्मान बढ़ जायेगा । इस सम्पूर्ण स्थिति से पूरे भारतवर्ष का समग्र विकास होगा । वर्णों और जातियों की दूरियाँ मिटेंगी । समानता बढ़ेगी , विषमता घटेगी । देश तभी और केवल तभी पुनः विश्व गुरू बनेगा ।
आइये हमारे साथ एक नये युग का सूत्रपात करें । अपने अपने समाजों के लेखन में रुचि रखनेवालों और लेखन तथा धर्म, दर्शन , कला के क्षेत्रों में काम करने वालों के विवरण हमें प्रेषित करने का कष्ट करें ।
आपका
राज कुमार सचान "होरी"
राष्ट्रीय संयोजक -- बदलता भारत ( INDIA CHANGES ) , राष्ट्रीय अध्यक्ष --- अर्जक साहित्य परिषद ।
www.indiachanges.com ,http/ horibadaltabharat.blogspot.com , http/ arjaksahityaparishad.blogspot.com
Email- horiindiachanges@gmail.com , indiachanges2013@gmail.com , horirajkumarsachan@gmail.com
Address -- Srs international school , 16 basant vihar , manas vihar road , Indira nagar , lucknow ( up) , India .
08938841199 , 08800228539
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हमारे देश में धर्मों के अनुपालन में जितना लचीलापन है उतना विश्व के किसी भी देश में नहीं है , परन्तु वहीं यह भी कटु सत्य है कि जातियों को लेकर जितनी कट्टरता और कठोरता अपने देश में है उतनी कहीं नहीं । हिन्दुओं में पूर्ण छूट है ------ईश्वर को साकार मानो चाहे निराकार , देवी मानो या देवता मानो , एक मानो चाहे अनेक । पूजा स्थल भी प्रथक ।धार्मिक पुस्तक भी प्रथक ।यहाँ तक अनीश्वरवादी , नास्तिक भी हिन्दू हो सकता है । हिन्दुओं की भाँति खुलापन दुनिया में अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं । मानव को इतनी स्वतन्त्रता वरेण्य है ।स्तुत्य है । तभी कदाचित भारत भूभाग ही ऐसा है जहाँ विश्व के सारे धर्म या तो जन्में हैं अथवा फूले फले हैं । इसका हमें गर्व है । यहाँ धर्मों पर शास्त्रार्थ करना परम्परा है । यही कारण रहा है कि इस भूभाग में धर्मों का विकास सर्वाधिक रहा है ।
धर्मों के क्षेत्र की स्वतन्त्रता और सरलता सामाजिक क्षेत्र में कहीं नहीं दिखती है । समाज में वर्ण और जातियों के अकाट्य बन्धन हैं , जिन्हें पहले कर्म से बनाया गया वे सब जन्म से होकर रूढ़ बन गयीं । जातियाँ व्यवसायों के आधार पर बनती रहीं और जितने व्यवसाय उतनी जातियों की स्थिति आ गयी । उदाहरण के लिये पान बेचने वाला तोली , बर्तन बनाने वाला कुम्हार , पानी भरने वाला कहार , लकड़ी का काम करने वाला बढ़यी, लोहे के काम वाला लोहार , कपड़े धोने वाला धानुक ,चमड़े के काम वाला चमार , नाव चलाने वाला केवट , भेड़ बकरी पालने वाला गड़रिया , गाय भैंस पालने वाला अहीर, सामान्य कृषक कुर्मी, सब्जी करने वाला काछी आदि आदि ।
व्यवसायों के अतिरिक्त अन्तरजातीय विवाहों से वर्ण संकर जातियाँ बनती रहीं । यहाँ तक कि धर्म परिवर्तन के बाद भी हिन्दू अपनी जातियों को वहांं भी ले गया । तभी मुस्लिम और ईसाइओं में भी जातियाँ मिलती हैं ।जातियों जातियों में जहाँ आरम्भ में कर्म का महत्व था धीरे धीरे जन्म महत्वपूर्ण होने लगा और इतिहास गवाह है कि जन्म आधारित जातीय हिंसा से यह देश लगातार पीड़ित रहा है ।
सामाजिक क्षेत्र में जितना रूढ़ हिन्दू समाज है उतना कोई भी नहीं । यहाँ जातियाँ जन्म से निर्धारित हो जाती हैं और कर्म से उनमें कोई भी बदलाव सम्भव नहीं । निम्न जाति कितना भी उच्च कार्य करे वह निम्न ही बनी रहती है , कभी भी उच्च जाति में प्रवेश नहीं कर पाती । इसी प्रकार उच्च जाति कितना भी निम्न और पतित काम करे वह बेधड़क , बेखौफ़ उच्च ही बनी रहती है , उसे किसी भी तरह निम्न जाति में जाने का ख़तरा नहीं रहता ।
वर्तमान जातिव्यवस्था में अच्छे और बुरे कर्मों का कोई स्थान नहीं । ब्राह्मण -ब्राह्मण रहेगा , वैश्य - वैश्य , क्षत्रिय -क्षत्रिय , शूद्र -शूद्र । यही नहीं इन चारों वर्णों के अन्तर्गत हज़ारों जातियाँ हैं जो भी वही की वही बनी रहती हैं। इस कठोर और आदिम व्यवस्था से हिन्दुस्तान का जहाँ सामाजिक विकास ठहर गया , वहीं सदियों से आपस में जातिगत दूरियाँ बनी रहीं । यहाँ तक हुआ है -- इतिहास गवाह है ,विदेशी आक्रमणों के समय भी हम जातीय दूरी के कारण एक होकर अपनी रक्षा न कर सके , भले ही बार बार गुलामी का कड़वा घूंट पीते रहे ।
जब बौद्ध धर्म आया तब कुछ काल के लिये ही सही मानववाद की स्थापना हुई , परन्तु भारत में उसकी स्थिति कुछ वर्षों के बाद कमज़ोर हो गई । जातियों और वर्णों के विरुद्ध समय समय पर आवाजें भी उठती रहीं और आन्दोलन भी होते रहे परन्तु निर्णायक युद्ध , आन्दोलन कभी लड़े ही नहीं जा सके । अम्बेडकर , लोहिया और दक्षिण भारत में रामास्वामी नायकर तो उत्तर भारत में राम स्वरूप वर्मा उल्लेखनीय नाम हैं ।
इन सबके बाद भी 21वीं सदी में भी स्थिति जस की तस है । जातिवाद कम नहीं हुआ है । जातीय दूरियाँ पहले की तरह बनी हुई हैं आरक्षणकी व्यवस्था से यद्यपि समानता बढ़ी है , परन्तु वैमनस्य भी बढ़ा है । आखिर इसका समाधान कहाँ है ?
आइये इस सामाजिक बीमारी का गहन परीक्षण करें । जहाँ उच्च जातियों में अपने से निम्न जातियों से समानता रखने में अरुचि है वहीं पिछड़ी और दलित जातियों में उच्च बनने की ललक तो है परन्तु रास्तों में भटकाव है । राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के प्रयत्नों में सफलता तो मिली , पर बात बनी नहीं । आंकड़े कुछ और ही कह रहे हैं । प्रगति के आंकड़े बहुत संतोषजनक नहीं कहे जा सकते । नौकरियों ,कुछ अन्य क्षेत्रों में प्रगति इतनी नाकाफी है कि समाज में पिछड़ों , दलितों को अभी भी सामाजिक दृष्टि से हेय समझा जाता है ।
हमें इसके लिये वर्ण व्यवस्था के मूल में जाना होगा । कार्यों का विभाजन देखिये ------जो बौद्धिक कार्य करे वह ब्राह्मण और उसे सर्वोच्च , सर्वश्रेष्ठ माना गया । जो रक्षा , सुरक्षा ,युद्ध ,शासन इत्यादि कार्य करे और सत्ता को स्थापित रखे वह क्षत्रिय और इसे द्वितीय स्थान मिला । ग्राम , नगर में व्यवसाय करने और मूल रूप से लक्ष्मी साधना करने वाले वैश्य या वणिक और यह वर्ण तृतीय स्थान पर आया । अन्तिम स्थान मिला उसे जो सबकी सेवा कार्य करे और कहलाया शूद्र । अब इसका सूक्ष्म परीक्षण कीजिये । एक -जनसंख्या के हिसाब से ऊपर के तीन वर्णों में आने वालों की संख्या कुल जनसंख्या का लगभग 20% है । सेवा कार्य करने वालों की संख्या 80% है । आज के पिछड़ों को किस वर्ण में रखेंगे -- शुद्ध क्षत्रिय वर्ण उन्हें अपने साथ नहीं रखता और शूद्रों से अपने को ऊपर मानते हैं । अनुसूचित और दलित तो हैं ही शूद्र वर्ण में । सामाजिक सम्मान की दृष्टि से देखें तो आज भी राजनैतिक सत्ता प्राप्त करने के बावजूद अहीर -अहीर कहा जाता है , कुर्मी -कुर्मी , चमार -चमार आदि आदि । ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य वर्ण वाला सम्मान इन्हें कभी नहीं मिल पाता है ।
स्वतन्त्र भारत में एक परिवर्तन और आया जिसका उल्लेख किया जाना आवश्यक होगा ।अब सामाजिक वर्गीकरण की अन्य तरह की चार श्रेणियाँ बन गई हैं । ये हैं ----(1) सामान्य जातियाँ
(2) पिछड़़ी जातियाँ
(3) अनुसूचित जातियाँ
(4) अनुसूचित जन जातियाँ
जनसंख्या का प्रतिशत महत्वपूर्ण है ।
सामान्य 20% , पिछड़ी 60% ,अनुसूचित 20%
इस जनसंख्या में 20% उच्च वर्णों के अन्दर और 80% निम्न वर्ण में हैं ।
पिछड़ों और दलितों में राजनैतिक चेतना के लिये समय समय पर जितना किया जाता रहा उसके मुकाबले बौद्धिक सत्ता प्राप्त करने के लिये न के बराबर काम हुये । राजनैतिक सत्ता को अगर ज्ञत्रियत्व माना जाय तो कहा जा सकता है कि क्षत्रिय बनने के लिये तो लगातार प्रयत्न हुये पर सर्वोच्च सत्ता --ब्राह्मणत्व को प्राप्त करने के लिये प्रयत्न लगभग किये ही नहीं गये । इन वर्गों में पढ़ाई -लिखाई , बौद्धिक कार्यों में अरुचि ही रही जिससे उच्च सम्मान के हकदार ये कभी न बन सके ।
समय समय पर इन समाजों में जागरूकता के कार्यक्रम तो चलाये गये पर सतही स्तर पर ही रहे । पिछड़ों , दलितों के विभिन्न संगठनों का ध्यान कभी भी बौद्धिक सत्ता प्राप्त करने पर टिका ही नहीं । मैं स्वयं जीवन भर इनके अनेक संगठनों में रहा परन्तु लाख प्रयत्न करने के बावजूद इनमें विशेष रुचि जाग्रत करने में असमर्थ रहा । वास्तव में ये सारे समाज अपने रूढ़िवादी ढांचे से ही त्रस्त हैं ।अपनी जड़ता से ग्रस्त ये समाज बौद्धिक कार्यों में रुचि ही नहीं लेते और अपनी मूढ़ता , पिछडे़पन का का सारा ठीकरा ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर फोड़ देते हैं । यही कारण है कि आज भी ,2013 तक इन वर्गों में लेखक , कवि , रचनाकार , पत्रकार , कलमकार , कलाकार दीपक लेकर खोजने से भी नहीं मिलते ।
इन वर्गों में इस दुर्गति को अच्छी तरह समझना होगा ।वास्तविक बीमारी को समझ कर ही उसका निदान खोजना उचित होता है । पहले यह मान लेना पड़ेगा कि अतीत की स्थिति कुछ भी रही हो ,कम से कम अब स्वतन्त्रता के बाद ब्राह्मणवाद को दोष देना कदापि उचित नहीं । अब मानना ही पड़ेगा कि हम में पढ़े लिखे कम हैं , विद्वान नहीं हैं , लेखक , कवि , पत्रकार नहीं , हम पुस्तकें नहीं लिख रहे ---तो इन सबके लिये केवल हमारा वर्ग ही दोषी है और विशेषकर सामाजिक और राजनैतिक नेता । इनकी सोच और मानसिकता आज भी पिछड़ी है , दलित है । आज भी भारी संख्या में इन वर्गों में शराब और नशे का सेवन है , पढ़ाई लिखाई के प्रति समर्पण नहीं ।
इस पृष्ठभूमि में विचारोपरान्त मेरे द्वारा इन 80% लोगों के समाजों के लिये लेखन में रुचि जाग्रत करने , व्यापक लेखकीय कर्म करने , पत्रकारिता करने , पुस्तकें लिखने , कलमकार और कलाकार बनने ---आदि क्षेत्रों में कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं । मेरी कोशिश है कि ज्ञान और बौद्धिक क्षेत्र के सारे कार्यों को ये वर्ग करने लगें और समाज के उच्च कहे जाने वर्गों के साथ कंधे से कन्धा मिलाने लगें । जब ये वर्ग बौद्धिक सत्ता प्राप्त कर लेंगे तब स्वयं ही ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो जायेंगे । धर्म , दर्शन , ज्ञान , विज्ञान के क्षेत्रों में इनका भारी दखल हो जाने से स्वयं सम्मान बढ़ जायेगा । इस सम्पूर्ण स्थिति से पूरे भारतवर्ष का समग्र विकास होगा । वर्णों और जातियों की दूरियाँ मिटेंगी । समानता बढ़ेगी , विषमता घटेगी । देश तभी और केवल तभी पुनः विश्व गुरू बनेगा ।
आइये हमारे साथ एक नये युग का सूत्रपात करें । अपने अपने समाजों के लेखन में रुचि रखनेवालों और लेखन तथा धर्म, दर्शन , कला के क्षेत्रों में काम करने वालों के विवरण हमें प्रेषित करने का कष्ट करें ।
आपका
राज कुमार सचान "होरी"
राष्ट्रीय संयोजक -- बदलता भारत ( INDIA CHANGES ) , राष्ट्रीय अध्यक्ष --- अर्जक साहित्य परिषद ।
www.indiachanges.com ,http/ horibadaltabharat.blogspot.com , http/ arjaksahityaparishad.blogspot.com
Email- horiindiachanges@gmail.com , indiachanges2013@gmail.com , horirajkumarsachan@gmail.com
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Saturday, 20 April 2013
समानता का समर्थन विषमता का विरोध
समानता का समर्थन विषमता का विरोध
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सभी मनुष्य जन्म से समान हैं । वर्णों , जातियों , धर्मों , भाषाओं आदि के आधार पर विभेद स्वयं मनुष्यों ने पैदा किये हैं । जन्मदाता नें तो केवल मनुष्य के रूप में ही हमें जन्म दिया है । इस लिये जहाँ भी ,जब भी ,जैसे भी विषमता का वर्णन होगा हम उसका खंडन और विरोध करेंगे । परन्तु उसी अंश तक । जैसे रामचरितमानस और मनुष्मृति में विषमता वाले अंशों का विरोध और खंडन , न कि सम्पूर्ण ग्रन्थों का ।
हमें यदि बहुदेववाद पर आस्था नहीं है तो हम उसको न माने और अपनी आस्था के अनुसार धर्म का पालन करें । यहाँ तक हम नया पन्थ चला सकते हैं या पुराने पन्थों , रीतिरिवाजों में संसोधन कर सकते हैं । हर व्यक्ति अपने अनुसार धर्म मानने के लिये पूर्ण स्वतन्त्र है । लेकिन कोई रास्ता खोजना होगा , जैसे स्वामी दयानन्द जी ने आर्य समाज की स्थापना कर के दिया था । बहुत पहले यही कार्य महात्मा बुद्ध और जैन मुनियों ने किया था ।
पर यह ध्यान रहे कि हम ज्ञान के ही विरोधी न हो जायें । क्या कारण है कि देश में 80%आबादी ( पिछड़ी,अनुसूचित ) में लेखकों , कवियों , पत्रकारों , कलाकारों , कलमकारों की संख्या नगण्य है । इन समाजों के लोगों ने स्वयं ही इन विद्या के क्षेत्रों में कभी ध्यान नहीं दिया और दोष सनातन व्यवस्था और ब्राह्मण समाज पर मढ़ते रहे । 1200 सौ वर्षों के मुस्लिम और अन्ग्रेजों के शासन में समाज के इन पिछड़े , दलित समाजों पर उच्च वर्णों की कोई पाबन्दी नहीं थी बल्कि इन समाजों ने स्वयं अपना सुधार नहीं किया । स्वयं विद्वान , पंडित बनने में कोई रुचि नहीं ली बस दूसरों को दोष देकर खानापूर्ति कर ली । विभिन्न विषयों पर किताबें इन वर्गों द्वारा न के बराबर लिखी गयीं । खेती , मज़दूरी में लगे रहे ,पढ़ने लिखने पर ध्यान नहीं दिया ।
1947 के पश्चात संविधान लागू है पर स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं । आज भी इन दलित , पिछड़ों द्वारा कितनी किताबें लिखी जा रही हैं ? कितने लेखक , पत्रकार , कवि हैं ? नहीं हैं तो दोष आज भी हम उच्च वर्णों को देते हैं । हम अपनी मूर्खताओं के लिये भी दोषी ब्राह्मणों और उच्च वर्गों को ठहराते हैं । आज भी ज्ञान सृजन पर कोई ध्यान नहीं । अधिक से अधिक राजनैतिक सत्ता पर ध्यान तो गया पर ज्ञान , सृजन उपेक्षित ही रहा ।
आइये हम सूरज पर थूकनें के बजाय उससे सीखें । ज्ञान अर्जित करें । समानता प्राप्त करें । दलित और पिछडे़ ,उच्च वर्गों , वर्णों के समकक्ष पहुँचे ।
राज कुमार सचान होरी
कवि,लेखक, साहित्यकार , वक्ता
राष्ट्रीय संयोजक ---India Changes .राष्ट्रीय अध्यक्ष ---अर्जक साहित्य परिषद
Mob.07599155999
Eid horiindiachanges@gmail.com , arjaksangh.s.p@gmail.com
www.indiachanges.com , horibadaltabharat.blogspot.com ,arjaksahityaparishad.blogspot.com
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सभी मनुष्य जन्म से समान हैं । वर्णों , जातियों , धर्मों , भाषाओं आदि के आधार पर विभेद स्वयं मनुष्यों ने पैदा किये हैं । जन्मदाता नें तो केवल मनुष्य के रूप में ही हमें जन्म दिया है । इस लिये जहाँ भी ,जब भी ,जैसे भी विषमता का वर्णन होगा हम उसका खंडन और विरोध करेंगे । परन्तु उसी अंश तक । जैसे रामचरितमानस और मनुष्मृति में विषमता वाले अंशों का विरोध और खंडन , न कि सम्पूर्ण ग्रन्थों का ।
हमें यदि बहुदेववाद पर आस्था नहीं है तो हम उसको न माने और अपनी आस्था के अनुसार धर्म का पालन करें । यहाँ तक हम नया पन्थ चला सकते हैं या पुराने पन्थों , रीतिरिवाजों में संसोधन कर सकते हैं । हर व्यक्ति अपने अनुसार धर्म मानने के लिये पूर्ण स्वतन्त्र है । लेकिन कोई रास्ता खोजना होगा , जैसे स्वामी दयानन्द जी ने आर्य समाज की स्थापना कर के दिया था । बहुत पहले यही कार्य महात्मा बुद्ध और जैन मुनियों ने किया था ।
पर यह ध्यान रहे कि हम ज्ञान के ही विरोधी न हो जायें । क्या कारण है कि देश में 80%आबादी ( पिछड़ी,अनुसूचित ) में लेखकों , कवियों , पत्रकारों , कलाकारों , कलमकारों की संख्या नगण्य है । इन समाजों के लोगों ने स्वयं ही इन विद्या के क्षेत्रों में कभी ध्यान नहीं दिया और दोष सनातन व्यवस्था और ब्राह्मण समाज पर मढ़ते रहे । 1200 सौ वर्षों के मुस्लिम और अन्ग्रेजों के शासन में समाज के इन पिछड़े , दलित समाजों पर उच्च वर्णों की कोई पाबन्दी नहीं थी बल्कि इन समाजों ने स्वयं अपना सुधार नहीं किया । स्वयं विद्वान , पंडित बनने में कोई रुचि नहीं ली बस दूसरों को दोष देकर खानापूर्ति कर ली । विभिन्न विषयों पर किताबें इन वर्गों द्वारा न के बराबर लिखी गयीं । खेती , मज़दूरी में लगे रहे ,पढ़ने लिखने पर ध्यान नहीं दिया ।
1947 के पश्चात संविधान लागू है पर स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं । आज भी इन दलित , पिछड़ों द्वारा कितनी किताबें लिखी जा रही हैं ? कितने लेखक , पत्रकार , कवि हैं ? नहीं हैं तो दोष आज भी हम उच्च वर्णों को देते हैं । हम अपनी मूर्खताओं के लिये भी दोषी ब्राह्मणों और उच्च वर्गों को ठहराते हैं । आज भी ज्ञान सृजन पर कोई ध्यान नहीं । अधिक से अधिक राजनैतिक सत्ता पर ध्यान तो गया पर ज्ञान , सृजन उपेक्षित ही रहा ।
आइये हम सूरज पर थूकनें के बजाय उससे सीखें । ज्ञान अर्जित करें । समानता प्राप्त करें । दलित और पिछडे़ ,उच्च वर्गों , वर्णों के समकक्ष पहुँचे ।
राज कुमार सचान होरी
कवि,लेखक, साहित्यकार , वक्ता
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